इक़ पीपल का उम्रदराज़ पेड़ आश्रय देता है हमारे प्रेम को ...और शायद आशीष भी..जिसका एहसास तब अधिक होता है ,जब हमें देर से घर पहुँचने पर भी किसी का कोप-भाजन नहीं बनना पड़ता ....या हमारे झूठे बहाने पकड़े नहीं जाते ...
Nawya - डायरी का एक पन्ना -8
गीत नवगीत कविता डायरी
31 July, 2013
25 July, 2013
एक नदी के हम दो धारे ...
मन पंछी जा रे उड़ जा रे
अब क्या बाकी है !
सब कुछ छूट गया उस पारे
अब क्या बाकी है !!
अपनी चारदिवारी प्रिय,
बाहर निकल सकी कब मैं !
और लांघकर कर ड्योढ़ी साथी
मुझ तक तुम कब आये !!
कितनी दूरी बीच हमारे
अब क्या बाकी है !
एक नदी के हम दो धारे
अब क्या बाक़ी है !!
साँसें रुकतीं प्राण न जाते ,
क्या जीवन है,क्षण-क्षण मरता !
झूठ नहीं कह पाता मन ये
लेकिन सच से भी डरता !
तपते सुख से दर्द सुखारे
अब क्या बाक़ी है !
आँखों से बहते जल-धारे
अब क्या बाक़ी है !!
है नितांत निर्जन वन सा मन
सन्नाटे को चीरे क्रंदन !
नहीं सुनाई देता जो वह
प्रेम कंटीला सुखमय तड़पन !
नीरवता से शोर भी हारे
अब क्या बाक़ी है !
स्वप्न हुए बेघर बंजारे
अब क्या बाक़ी है !!
-भावना
24 June, 2013
गीत ....यातनाएँ प्रेम कीं ..!!
हो गया संपन्न सम्मेलन
लोग बनकर रह गए दोलन
और परिभाषित न फिर से हो सकीं
व्याख्याएँ प्रेम कीं ..!!
निकटतम संबंध बोझीले हुए
जन्म के अनुबंध फ़िर ढीले हुए
सोच भर से शुष्क दृग गीले हुए !
और आच्छादित न फ़िर से हो सकीं
भावनाएँ प्रेम कीं ...!!
हो गए पूरे सभी भाषण
बस दिखावे को रहा हर प्रण
जानकी को छल गया रावण !
और वरदानित न फ़िर से हो सकीं
साधनाएँ प्रेम कीं ...!!
संकलन अपनों परायों का
ज़िंदगी है ग्रंथ साँसों का
संधि-विग्रह औ'समासों का !
और संपादित न फ़िर से हो सकीं
यातनाएँ प्रेम कीं ..!!
भाव को साकार कर पाए नहीं
बेड़ियाँ,प्रतिबंध,गल पाए नहीं
रीति का प्रतिकार कर पाए नहीं !
और स्वरसाधित न फ़िर से हो सकीं
शुभऋचाएँ प्रेम कीं ...!!
-- भावना
बस इक़ तुम ही नहीं
आज भी मेरी
नींदों पर
पहरा है
अश्कों का ....!
हथेलियाँ
बदलतीं हैं
करवटें ......!
भीगे-भीगे लिहाफ़,
सिलवटों में
बसी ख़ुशबू ...!
बिख़रते हुए ख़्वाब
सब तो हैं ..
अपनी-अपनी जगह...
बस इक़ तुम ही नहीं
आख़िर
तुम हो कहाँ
दिखते
क्यों नहीं .......!!
-Bhavana
नींदों पर
पहरा है
अश्कों का ....!
हथेलियाँ
बदलतीं हैं
करवटें ......!
भीगे-भीगे लिहाफ़,
सिलवटों में
बसी ख़ुशबू ...!
बिख़रते हुए ख़्वाब
सब तो हैं ..
अपनी-अपनी जगह...
बस इक़ तुम ही नहीं
आख़िर
तुम हो कहाँ
दिखते
क्यों नहीं .......!!
-Bhavana
20 June, 2013
लड़की
खोई खोई ..
दुनिया से बेखबर ..
रात भर रोई... !!
थी क्या
आटे की लोई..
गूँदा ..रौंदा ..मसला ..
डाल दिए कितने धब्बे ..
जैसे कोई सिंकी हुई रोटी ....
ओह...
ये क्या कर गया कोई ...
ऐसे प्यार कर गया कोई ...
रात भर रोई ..!!
पहले प्यार
में डूबी लड़की .
~.भावना.~
~.भावना.~
19 June, 2013
पहचान
मुझको जैसा चाहा
दिया आकार
गीली मिट्टी बन
मैं ढल गई
तुम्हारे साँचे में ...!!
मुझपर जैसा चाहा
रंग चढ़ाया
सादा कैनवास बन
मैं समा गई
तुम्हारी तूलिका में ..!!
मुझको शब्दों में
पिरोया तुमने
मैं बन गई कविता ...!!
पर,जब आज मैंने
चाही तलाशनी
पहचान अपनी ...
आईना देख
मैं हो गई
पानी-पानी !!
~भावना~
16 June, 2013
बेहतर होता
कभी-कभी कुछ,
कह देने से
बेहतर होता,
है चुप होना .!!
मौन,कहानी कहता
हो जब आकर्षण की !
चिंगारी उठती,दिमाग़
औ मन-घर्षण की !!
कभी-कभी दुख,
पी लेने से,
बेहतर होता
जीभर रोना !!
~.भावना.~
14 June, 2013
11 June, 2013
क़िरदार
कठपुतलियाँ
लगीं नाचने
इशारों पर उँगलियों के ..!!
कभी सांस ज़रा ऊपर
तो कभी ज़रा नीचे !
न हँसी हुई अपनी
न आँसू रहे अपने,
उतना ही बढ़े पग
वो जितनी डोर खींचे !
देखो ना
परदा उठते ही
बदल गया
क़िरदार !
- भावना
परदा उठते ही
बदल गया
क़िरदार !
- भावना
09 June, 2013
03 May, 2013
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02 May, 2013
30 April, 2013
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29 April, 2013
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28 April, 2013
20 April, 2013
17 April, 2013
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