गीत नवगीत कविता डायरी

29 April, 2015

मैं भूल जाऊँ कृष्ण को

जीवन में हर पुरुष का तिरस्कार नहीं किया जा सकता ...नहीं की जा सकती उसकी उपस्थिति  ख़ारिज़ ...तब जबकि ,मेरा भाई एक पुरुष है ..मेरा पिता एक पुरुष है ..मेरा पति एक पुरुष है ...मेरा शिक्षक भी कई बार कोई पुरुष ही रहा ....मेरा साथी मित्र पुरुष है ..मेरे साथ तमाम वे हाथ पुरुषों के हैं जिन्होंने मुझे ऊँचाइयां देने में  मेरा साथ दिया जब महिलाओं ने दकियानूसी सोच रखी और बेड़ियाँ पहनाने को कोशिश की ....

मैंने कभी पलट कर नहीं देखा अपनी ओर ...मैं याद रखूँ दुर्योधन को ,दुश्साशन को ...और मैं भूल जाऊँ कृष्ण को ....मैं याद रखूँ रावण को ...मैं भूल जाऊँ राम के पदचिंह्न ....

..मैं केवल इसलिए लिखूँ पुरुष -विरोधी आलेख ...पुरुष विरोधी कविता ..कि मुझे मिले वाहवाही .और नारी सशक्तीकरण में अपनी भागीदारी दर्ज़ करा सकूँ ..प्रगतिशीलता का टैग मेरे साथ आसानी से जुड़ सके ...कई बार मुझे ज़रूरत होती है कि कहीं मैं आधुनिकता के नाम पर कुछ अपने दैव प्रद्दत स्त्रैण गुणों का नाश तो नहीं कर रही ..झाँकना  चाहती हूँ भीतर अपने ..और प्रश्नों के उत्तर चाहती हूँ केवल अपनी अंतरआत्मा से  .!!