गीत नवगीत कविता डायरी

24 June, 2013

गीत ....यातनाएँ प्रेम कीं ..!!

हो गया संपन्न सम्मेलन 
लोग बनकर रह गए दोलन 
और परिभाषित न फिर से हो सकीं 
व्याख्याएँ प्रेम कीं ..!!
निकटतम संबंध बोझीले हुए 
जन्म के अनुबंध फ़िर ढीले हुए 
सोच भर से शुष्क दृग गीले हुए !
और आच्छादित न फ़िर से हो सकीं 
भावनाएँ प्रेम कीं ...!!
हो गए पूरे सभी भाषण 
बस दिखावे को रहा हर प्रण 
जानकी को छल गया रावण !
और वरदानित न फ़िर से हो सकीं 
साधनाएँ प्रेम कीं ...!!
संकलन अपनों परायों का 
ज़िंदगी है ग्रंथ साँसों का 
संधि-विग्रह औ'समासों का !
और संपादित न फ़िर से हो सकीं 
यातनाएँ प्रेम कीं ..!!
भाव को साकार कर पाए नहीं                     
बेड़ियाँ,प्रतिबंध,गल पाए नहीं 
रीति का प्रतिकार कर पाए नहीं !
और स्वरसाधित न फ़िर से हो सकीं 
शुभऋचाएँ प्रेम कीं ...!!
            --  भावना