गीत नवगीत कविता डायरी

14 October, 2015

चलो बस यूँ ही

ये पद्मश्री
ये प्रशस्तियाँ
ये अकादमी
ये हस्तियाँ
ये बड़े-बड़े नाम
और उनके काम
नहीं जानती मैं
मैं मेरी बस्ती की
बस एक सखी को जानती हूँ
अभी कुछ दिन पहले ही तो
ईद की दी थीं उसने बधाईयाँ
मैंने खिलाईं थीं ख़ास मेवे वाली सिवइयाँ !!
सुनो महानुभावो
बड़ी चर्चा है आजकल तुम्हारी
सुना है बड़े फ़िक्रमंद हो तुम
पर सुनो ,कान खोलकर सुनो
दीवाली आने वाली है
ख़ुदा होने का दंभ भरने वालों
वातानुकूलित कक्षों में बैठकर
जनमानस का दर्द लिखने वालों
अपने भीतर भी इक़ दिया जलाना
मैं तुम्हें खिलाऊँगी मिठाइयाँ
भूल जाओगे फ़िर पुरस्कारों की रेवड़ियाँ
करूँगी जयगान तुम्हारा
फ़िर हृदयों पर लिखे जाएँगे
तुम्हारे यश -अभिलेख
जिन्हें तुम चाहकर भी
लौटाने की हिमाक़त न कर सकोगे !!
      भावना तिवारी