गीत नवगीत कविता डायरी

24 June, 2013

बस इक़ तुम ही नहीं

आज भी मेरी 
नींदों पर 
पहरा है 
अश्कों का ....!
हथेलियाँ 
बदलतीं हैं 
करवटें ......!
भीगे-भीगे लिहाफ़,
सिलवटों में
बसी ख़ुशबू ...!
बिख़रते हुए ख़्वाब 
सब तो हैं ..
अपनी-अपनी जगह...
बस इक़ तुम ही नहीं 
आख़िर 
तुम हो कहाँ 
दिखते 
क्यों नहीं .......!!


      -Bhavana