गीत नवगीत कविता डायरी

03 January, 2015

अस्तित्व-प्रमाण

चौखट पर उकेरे 

कितने ही स्वास्तिक,

मुख्यद्वार पर छोड़े

हाथों के थापे ,

वो मंगल गान 

जिनमें समाहित था कल्याण ।

मैं ही कर्त्ता थी 

मैं ही शुभ थी

मुखमंडल था आभयमान ।

पर देहरी लाँघते ही 

बदल गए अर्थ ..

वो स्वस्तिवाचन 

मेरे स्वर को कर गया मौन

शीशे से घुलते हैं भाव

पोषित होता है संताप ।

यज्ञ की आहुतियां 

जला गईं मेरा लेख ,

शांति का स्वप्न 

बढ़ा गया अश्रुओं का ताप ।

है मुझे खेद

ओ मेरे जीवन वेद

नहीं फला मुझे तेरा 

श्रीमय उच्चारण /

सप्तपदों के बाद 

मुझ मंगलकारी को निर्विवाद

आपसे चाहिए होता है श्रीमान 

मेरे अस्तित्व का प्रमाण ।।

      @-भावना