गीत नवगीत कविता डायरी

25 April, 2015

प्रीत गा ले




बाँझ होने पाए ना यह लेखनी
पीर लिख ले
मीत गा ले !!


गर्भिणी हो आज रह ले
विरहिणी सम दर्द सह ले
तोड़ कर जंजीर चुप की
आतंरिक एहसास कह ले !
जन्म ले जब कोई रचना
हृदय हर्षित
जीत गा ले !!


करुण होकर,क्रुद्ध होकर ,
द्रवित हो मन बुद्ध होकर !
सृष्टि की पदचाप सुनले
प्रेम-पथ का हाथ गह ले
छंद-लय-गति जोड़ना
ताड़ना कितनी मिले मत छोड़ना
गीत गा ले !
  

6 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (26-04-2015) को "नासमझी के कारण ही किस्मत जाती फूट" (चर्चा अंक-1957) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  2. सुन्दर और प्रेरक रचना

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  3. सुन्दर व सार्थक रचना प्रस्तुतिकरण के लिए आभार..
    मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका इंतजार...

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  4. खूबसूरत गीत।
    इस लेखनी के लिए प्रणाम।

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  5. बहुत सुन्दर पंक्तियाँ!

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