गीत नवगीत कविता डायरी

12 January, 2013

गीत





मोम ह्रदय जलने को आतुर,
प्राण तडपती पीड़ा बाँटें..
किसे समय अंतस में झांके !

शहर भागता दौड़ा जाये
ना पकड़ा ना छोड़ा जाये !
पिंजरे की सांकल ना खुलती
द्वार न तम का तोडा जाये !

अंतहीन चिर मेरा चलना 
जीवन छोटा लम्बी राहें !!

आदि अंत का छोर न जानूं 
तू मुझमें बस इतना जानूं !
सात युगों से प्रण है मिटकर
एक बार प्रिय तुमको पालूँ !

सप्त-तलों की गहराई है
अधर सिन्धुतट पर भी प्यासे !!

किसे समय अंतस में झांके.... !