गीत नवगीत कविता डायरी
30 April, 2013
नवगीत: पके पान झर गये
नवगीत: पके पान झर गये: -नरेन्द्र शर्मा पके पान झर गये डाल पर नये पान आये पल्लव के धर देह नेह के नए प्रान आये । लाल हो गयी डाल हो गया धरती-तल पीला सर्जन...
29 April, 2013
नवगीत की पाठशाला: पेड़ नीम का छाया वाला
नवगीत की पाठशाला: पेड़ नीम का छाया वाला: चैत्र जैसे जैसे आगे बढ़ रहा है नीम की हरी पत्तियों में सफेद फूलों की भरमार हो रही है। जल्दी ही ये फूल झरने लगेंगे और फगुनाहट के साथ हव...
28 April, 2013
20 April, 2013
17 April, 2013
16 February, 2013
14 February, 2013
प्रेम-संबंध..
वो दिन कुछ और थे,
जब इक़ निगाह की
हल्की सी छुअन
भर जाती थी ज़िस्म का
रेशा-रेशा,पोर-पोर ख़ुश्बू से...
यादों का पुलिंदा
समेटते-समेटते
भर आतीं थीं,अनायास ही
मुस्कुराते हुए होठों के साथ आँखें।..
जिनमें अभी तक
प्यार की क़सक ज़िंदा है !!.
आज इश्तेहार सा चेहरा,
मासूमियत ढूँढता है
टैडी बिअर में...
विदेशी नस्ल के गुलाबों में,
पाना चाहे मन
मिट्टी की सौंधी महक...
मिठास का एहसास...
चाहता है चौकलेट के टुकड़े में..
उफ़,शो रूम के डिस्प्ले में रखे..
शो पीस सा प्रेम-संबंध..
सोचती हूँ कितना मँहगा
हो गया है प्रणय अनुबंध !!
~भावना
-सार्थकता-
सुनो,एक कप चाय देने से शुरू
हर सुबह घर सँवारने में लगाई,
कभी मुन्ना को संभाला
कभी मुन्नी की चुटिया बनाई!
बांधा परिवार अपने पल्लू में
दिनभर जिमेदारी निभाई,
थकी हुई रात की चारपाई,
निढाल हो,
कटे पेड़ सा गिरना.
सारी उम्र का खटना...
कभी प्रणय दिवस मनाने की
सुधि ही नहीं आई ....!!
पर सुनो..
कितना सुकून है
कि अपना अनकहा प्रेम भी,
कितना सार्थक था..
कि घर के पंछी छू रहे हैं
आकाश की ऊँचाई ...!!!
~भावना
13 February, 2013
प्रेम
छौंक देती हूँ ...
ख़ुदी को !
चमचे में खौलता तेल,
जैसे उबाल मारता ख़ून !
चटखता हुआ जीरा,
ज्यूँ टूटते हुए ख़्वाब.!
रोज़ परोस देती हूँ
अपना वज़ूद,
वक़्त की थाली में !
ढूँढती हूँ प्रेम,
तुम्हारी गाली में !!
12 February, 2013
09 February, 2013
30 January, 2013
14 January, 2013
गीत ..बेटियाँ
गंगा की जलधार सीं ,
अर्घ्य की पावनधार सीं ,
जीवन के आधार सीं .
भोर सजीली भक्ति रूप
होतीं हैं बेटियाँ ..!!
सुभग अल्पना द्वार कीं,
सजतीं वंदनवार सीं/
महकें हरसिंगार सीं ,
जीवन भर की छाँह -धूप
होतीं हैं बेटियाँ ..!!
बाबा के सत्कार सीं ,
मर्यादा परिवार कीं ,
बेमन हैं स्वीकार सीं ,
धीर धरे चुप गहन कूप
होतीं हैं बेटियाँ ...!!!
अर्घ्य की पावनधार सीं ,
जीवन के आधार सीं .
भोर सजीली भक्ति रूप
होतीं हैं बेटियाँ ..!!
सुभग अल्पना द्वार कीं,
सजतीं वंदनवार सीं/
महकें हरसिंगार सीं ,
जीवन भर की छाँह -धूप
होतीं हैं बेटियाँ ..!!
बाबा के सत्कार सीं ,
मर्यादा परिवार कीं ,
बेमन हैं स्वीकार सीं ,
धीर धरे चुप गहन कूप
होतीं हैं बेटियाँ ...!!!
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