गीत नवगीत कविता डायरी
29 April, 2015
27 April, 2015
25 April, 2015
प्रीत गा ले
बाँझ होने पाए ना यह लेखनी
पीर लिख ले
मीत गा ले !!
गर्भिणी हो आज रह ले
विरहिणी सम दर्द सह ले
तोड़ कर जंजीर चुप की
आतंरिक एहसास कह ले !
जन्म ले जब कोई रचना
हृदय हर्षित
जीत गा ले !!
करुण होकर,क्रुद्ध होकर ,
द्रवित हो मन बुद्ध होकर !
सृष्टि की पदचाप सुनले
प्रेम-पथ का हाथ गह ले
छंद-लय-गति जोड़ना
ताड़ना कितनी मिले मत छोड़ना
गीत गा ले !
22 April, 2015
02 February, 2015
गीत गा ले !!
बाँझ होने पाए ना यह लेखनी
पीर लिख ले
मीत गा ले !!
गर्भिणी हो आज रह ले
विरहिणी सम दर्द सह ले
तोड़ कर जंजीर चुप की
आतंरिक एहसास कह ले !
जन्म ले जब कोई रचना
हृदय हर्षित
जीत गा ले !!
करुण होकर,क्रुद्ध होकर ,
द्रवित हो मन बुद्ध होकर !
सृष्टि की पदचाप सुनले
प्रेम-पथ का हाथ गह ले
छंद-लय-गति जोड़ना
ताड़ना कितनी मिले मत छोड़ना
गीत गा ले !
भावना तिवारी
14 January, 2015
भीख में प्रेम
क्यूँ मांगते हो भीख जैसी प्रेम की अब
सोचा नहीं ..इतने दिनों से कभी
गुज़रे होंगे दिवस कैसे
और ये ख़ामोश चीखतीं
विलाप करती हुईं रातें ...
कभी पलट कर देखा
कैसे हो गई विलीन
मेरे अधरों की मुस्कुराती रेखा ..
बहुत आगे पग बढ़ा
कर पीछे लौटना
मेरा बार-बार
पुरानी बातों का औटना .
तुम्हारा तथाकथित प्रेम
पीछे छोड़ आई हूँ
मेरा बिखरना
गए दिनों की बात है
अब मेरा हौसला मेरे साथ है
तंज़ सारे मरोड़कर
रंज़ सारे छोड़कर
पंथ अपना चुन लिया मैंने
ख़ुद को इन अक्षरों में
बुन लिया मैंने ...!!
~भावना
~भावना
12 January, 2015
03 January, 2015
अस्तित्व-प्रमाण
चौखट पर उकेरे
कितने ही स्वास्तिक,
मुख्यद्वार पर छोड़े
हाथों के थापे ,
वो मंगल गान
जिनमें समाहित था कल्याण ।
मैं ही कर्त्ता थी
मैं ही शुभ थी
मुखमंडल था आभयमान ।
पर देहरी लाँघते ही
बदल गए अर्थ ..
वो स्वस्तिवाचन
मेरे स्वर को कर गया मौन
शीशे से घुलते हैं भाव
पोषित होता है संताप ।
यज्ञ की आहुतियां
जला गईं मेरा लेख ,
शांति का स्वप्न
बढ़ा गया अश्रुओं का ताप ।
है मुझे खेद
ओ मेरे जीवन वेद
नहीं फला मुझे तेरा
श्रीमय उच्चारण /
सप्तपदों के बाद
मुझ मंगलकारी को निर्विवाद
आपसे चाहिए होता है श्रीमान
मेरे अस्तित्व का प्रमाण ।।
@-भावना
12 February, 2014
09 August, 2013
पावस के दिन
पावस के सब दिन कल-कल कर बीत गए //
पल-पल उँगली के पोरों पर रीत गए /
पल-पल उँगली के पोरों पर रीत गए /
साँझ हुई फ़िर जला लिया ,दीपक उर में ,
ड्योढ़ी पर बैठी न लगे मन अब घर में /
साँसों की लौ रह-रह ,सहसा तेज़ हुई ,
आँखों की चौखट पावस की सेज हुई /
ताकूँ पंथ न जाने किस पथ मीत गए //
पावस के सब दिन कल-कल कर बीत गए //
यादों की बौछारों पर ,मन रीझ गया ,
काजल वाले जल से आँचल भीज गया /
प्राणों पर निष्ठुर बिजली डोरे डाले ,
विचलित करते मन बरबस बादल काले /
मैं हारी ये सारे विषधर जीत गए //
पावस के सब दिन कल-कल कर बीत गए //
पथराये मन पर छाई दुख की काई ,
धीरज के पाँवों में फिर फिसलन आई /
पलकों की चादर पर दृग आँसू टाँकें ,
उर की दीवारें मिलकर सिसकन बाँटें /
स्वर लहरी में तड़पन भर-भर गीत गए /
पावस के सब दिन कल-कल कर बीत गए //
08 August, 2013
Nawya - डायरी का एक पन्ना - 9
ऐसे लगता है जैसे इस घर का हर कोना ,हर दीवार ,घर की चौखट ..घर की छत ......सब हैं कठपुतलियाँ ...पापा के हाथों की कठपुतलियाँ .......पापा कभी प्यार से भी तो खींच सकते हैं न आप डोर ...हम सभी को है प्रतीक्षा ...पिंजरे के खुल जाने की ....अय आकाश ...तुम कितनी दूर हो मुझसे,हवा तुम पकड़ में क्यों नहीं आती ..
Nawya - डायरी का एक पन्ना - 9
Nawya - डायरी का एक पन्ना - 9
31 July, 2013
Nawya - डायरी का एक पन्ना -8
.......हम हाथ थामने तक से डरते हैं ...हर निग़ाह लगती है पहरेदार ....
इक़ पीपल का उम्रदराज़ पेड़ आश्रय देता है हमारे प्रेम को ...और शायद आशीष भी..जिसका एहसास तब अधिक होता है ,जब हमें देर से घर पहुँचने पर भी किसी का कोप-भाजन नहीं बनना पड़ता ....या हमारे झूठे बहाने पकड़े नहीं जाते ...
Nawya - डायरी का एक पन्ना -8
25 July, 2013
एक नदी के हम दो धारे ...
मन पंछी जा रे उड़ जा रे
अब क्या बाकी है !
सब कुछ छूट गया उस पारे
अब क्या बाकी है !!
अपनी चारदिवारी प्रिय,
बाहर निकल सकी कब मैं !
और लांघकर कर ड्योढ़ी साथी
मुझ तक तुम कब आये !!
कितनी दूरी बीच हमारे
अब क्या बाकी है !
एक नदी के हम दो धारे
अब क्या बाक़ी है !!
साँसें रुकतीं प्राण न जाते ,
क्या जीवन है,क्षण-क्षण मरता !
झूठ नहीं कह पाता मन ये
लेकिन सच से भी डरता !
तपते सुख से दर्द सुखारे
अब क्या बाक़ी है !
आँखों से बहते जल-धारे
अब क्या बाक़ी है !!
है नितांत निर्जन वन सा मन
सन्नाटे को चीरे क्रंदन !
नहीं सुनाई देता जो वह
प्रेम कंटीला सुखमय तड़पन !
नीरवता से शोर भी हारे
अब क्या बाक़ी है !
स्वप्न हुए बेघर बंजारे
अब क्या बाक़ी है !!
-भावना
24 June, 2013
गीत ....यातनाएँ प्रेम कीं ..!!
हो गया संपन्न सम्मेलन
लोग बनकर रह गए दोलन
और परिभाषित न फिर से हो सकीं
व्याख्याएँ प्रेम कीं ..!!
निकटतम संबंध बोझीले हुए
जन्म के अनुबंध फ़िर ढीले हुए
सोच भर से शुष्क दृग गीले हुए !
और आच्छादित न फ़िर से हो सकीं
भावनाएँ प्रेम कीं ...!!
हो गए पूरे सभी भाषण
बस दिखावे को रहा हर प्रण
जानकी को छल गया रावण !
और वरदानित न फ़िर से हो सकीं
साधनाएँ प्रेम कीं ...!!
संकलन अपनों परायों का
ज़िंदगी है ग्रंथ साँसों का
संधि-विग्रह औ'समासों का !
और संपादित न फ़िर से हो सकीं
यातनाएँ प्रेम कीं ..!!
भाव को साकार कर पाए नहीं
बेड़ियाँ,प्रतिबंध,गल पाए नहीं
रीति का प्रतिकार कर पाए नहीं !
और स्वरसाधित न फ़िर से हो सकीं
शुभऋचाएँ प्रेम कीं ...!!
-- भावना
बस इक़ तुम ही नहीं
आज भी मेरी
नींदों पर
पहरा है
अश्कों का ....!
हथेलियाँ
बदलतीं हैं
करवटें ......!
भीगे-भीगे लिहाफ़,
सिलवटों में
बसी ख़ुशबू ...!
बिख़रते हुए ख़्वाब
सब तो हैं ..
अपनी-अपनी जगह...
बस इक़ तुम ही नहीं
आख़िर
तुम हो कहाँ
दिखते
क्यों नहीं .......!!
-Bhavana
नींदों पर
पहरा है
अश्कों का ....!
हथेलियाँ
बदलतीं हैं
करवटें ......!
भीगे-भीगे लिहाफ़,
सिलवटों में
बसी ख़ुशबू ...!
बिख़रते हुए ख़्वाब
सब तो हैं ..
अपनी-अपनी जगह...
बस इक़ तुम ही नहीं
आख़िर
तुम हो कहाँ
दिखते
क्यों नहीं .......!!
-Bhavana
20 June, 2013
लड़की
खोई खोई ..
दुनिया से बेखबर ..
रात भर रोई... !!
थी क्या
आटे की लोई..
गूँदा ..रौंदा ..मसला ..
डाल दिए कितने धब्बे ..
जैसे कोई सिंकी हुई रोटी ....
ओह...
ये क्या कर गया कोई ...
ऐसे प्यार कर गया कोई ...
रात भर रोई ..!!
पहले प्यार
में डूबी लड़की .
~.भावना.~
~.भावना.~
19 June, 2013
पहचान
मुझको जैसा चाहा
दिया आकार
गीली मिट्टी बन
मैं ढल गई
तुम्हारे साँचे में ...!!
मुझपर जैसा चाहा
रंग चढ़ाया
सादा कैनवास बन
मैं समा गई
तुम्हारी तूलिका में ..!!
मुझको शब्दों में
पिरोया तुमने
मैं बन गई कविता ...!!
पर,जब आज मैंने
चाही तलाशनी
पहचान अपनी ...
आईना देख
मैं हो गई
पानी-पानी !!
~भावना~
16 June, 2013
बेहतर होता
कभी-कभी कुछ,
कह देने से
बेहतर होता,
है चुप होना .!!
मौन,कहानी कहता
हो जब आकर्षण की !
चिंगारी उठती,दिमाग़
औ मन-घर्षण की !!
कभी-कभी दुख,
पी लेने से,
बेहतर होता
जीभर रोना !!
~.भावना.~
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